Modern life and peace of mind by gita

Love Without Attachment: Can the Heart Follow Dharma

गीता की दृष्टि से आधुनिक जीवन और मानसिक शांति

 

भगवद् गीता के अनुसार “मानव जीवन कठिन या सरल” इस पर निर्भर करता है कि मनुष्य अपने जीवन को कर्म, ज्ञान और भक्ति के किस दृष्टिकोण से देखता है।

गीता यह नहीं कहती कि जीवन स्वाभाविक रूप से कठिन या आसान है — बल्कि यह बताती है कि जीवन का संघर्ष मन की अवस्था से उत्पन्न होता है।

 

कठिनाई मन की आसक्ति से उत्पन्न होती है

गीता 2.47:

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

 

अर्थात् — तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता में नहीं।

 

जब मनुष्य फल की आसक्ति छोड़ देता है, तब उसके लिए जीवन कठिन नहीं रहता।
आज का मनुष्य जब अपने कर्मों का परिणाम ही सब कुछ मान लेता है, तभी कठिनाई महसूस होती है।

 

ज्ञान से अज्ञान का अंधकार मिटता है

गीता 4.39:
“श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।”

 

अर्थात् — जो श्रद्धावान और संयमी है, वह ज्ञान प्राप्त करता है और फिर शांति को पाता है।

 

जब ज्ञान होता है कि हर स्थिति अस्थायी है, तब कठिनाई का बोध कम हो जाता है।
इसलिए जो व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से जीता है, उसके लिए जीवन सरल लगता है।

 

भक्ति से जीवन सहज बनता है

गीता 9.22:

“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते, तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।”

 

भगवान कहते हैं — जो मुझमें अनन्य भाव से लीन रहते हैं, उनके योग (जो नहीं है उसे प्राप्त कराना) और क्षेम (जो है उसकी रक्षा) का मैं स्वयं भार उठाता हूँ।

 

इसका अर्थ है कि जब मनुष्य ईश्वर पर भरोसा रखता है, तब जीवन का बोझ हल्का हो जाता है।

 

 

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आज का जीवन कठिन इसलिए लगता है क्योंकि…

गीता के दृष्टिकोण से देखें तो आधुनिक मानव जीवन कठिन “वास्तविक परिस्थितियों” के कारण नहीं, बल्कि

 

इच्छाओं की वृद्धि,

 

आसक्ति,

 

परिणामों की चिंता,

 

और अहंकार के कारण कठिन बन गया है।

 

जब इनसे मन मुक्त होता है, तब चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, जीवन सहज हो जाता है।

 

संक्षेप में:

गीता कहती है — “मनुष्य का जीवन कठिन नहीं है, कठिन उसका मन है।”

 

जो मन को साध लेता है, उसके लिए संसार भी साधन बन जाता है;
और जो मन के वश में रहता है, उसके लिए सरल जीवन भी कठिन बन जाता है।

 

भगवद् गीता के अनुसार कठिनाइयों से निपटने के व्यावहारिक (प्रायोगिक) उपाय क्या हैं।

 

गीता के अनुसार कठिनाइयों से निपटने के 5 व्यावहारिक उपाय

1. मन को स्थिर करो — “स्थिति प्रज्ञता”

गीता 2.70:

“आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्, तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे, स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।”

 

अर्थात् — जैसे नदियाँ सागर में जाकर भी उसे विचलित नहीं करतीं, वैसे ही इच्छाएँ जिस ज्ञानी के मन में आकर भी उसे डिगाती नहींं, वही शांति पाता है।

 

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व्यावहारिक अर्थ:

हर स्थिति में मन को संयमित रखो — न अधिक प्रसन्नता में उछलो, न दुःख में टूटो।
प्रतिदिन ध्यान या प्राणायाम करने से मन की स्थिरता बढ़ती है।

 

कर्मयोग अपनाओ — कर्म करते रहो, फल की चिंता छोड़ो

गीता 3.19:

“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।”

 

व्यावहारिक अर्थ:

जो काम सामने है, उसे पूर्ण निष्ठा से करो —

परिणाम अपने आप आएगा।

ऐसा करने से तनाव और भय दोनों घटते हैं।

 

समत्व भाव रखो — सुख-दुःख को समान समझो

गीता 2.38:

“सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।”

 

व्यावहारिक अर्थ:

जीवन के उतार-चढ़ाव को प्राकृतिक मानो।

हर स्थिति “सीखने का अवसर” है, न कि “समस्या”।

इससे मानसिक संतुलन बना रहता है।

 

भक्ति और विश्वास रखो — ईश्वर में समर्पण

गीता 18.66:

“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”

 

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व्यावहारिक अर्थ:

कठिन समय में विश्वास रखो कि एक बड़ी शक्ति तुम्हारा मार्गदर्शन कर रही है।
इससे आत्मबल और साहस बना रहता है।

 

स्वधर्म का पालन करो — अपने कर्तव्य से न भागो

गीता 3.35:
“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।”

 

व्यावहारिक अर्थ:

दूसरों की राह की नकल मत करो।
अपना कर्तव्य, अपनी क्षमता और परिस्थिति के अनुसार निभाओ।
इससे आत्मसंतोष और स्थिरता आती है।

 

निष्कर्ष:

जीवन में कठिनाइयाँ स्थायी नहीं होतीं;

पर शांत और सजग मन ही वह औज़ार है जिससे उन्हें सरल बनाया जा सकता है।

 

गीता का सार:

“मनुष्य बाहरी परिस्थितियों से नहीं, अपने मन के भावों से हारता या जीतता है।”

 

भगवद् गीता के दृष्टिकोण से गहराई से समझें —

“आज का मानव जीवन इतना कठिन क्यों है?”

गीता के अनुसार मानव जीवन कठिन क्यों प्रतीत होता है

 

गीता यह स्पष्ट करती है कि जीवन स्वयं कठिन नहीं होता,
बल्कि मनुष्य का दृष्टिकोण, आसक्ति (attachment), और अज्ञान (ignorance) ही कठिनाइयों का मूल कारण है।

 

 

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अशांत मन — कठिनाई का सबसे बड़ा कारण

गीता 6.6:
“बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।”

 

अर्थात् — जिसने अपने मन को वश में कर लिया, उसका मन उसका मित्र है;

 

जिसने मन को वश में नहीं किया, उसका मन उसका शत्रु है।

आज का मनुष्य बाहरी सुविधाओं में निपुण है,
पर मन को शांत रखने की कला खो चुका है।

इसीलिए छोटी-छोटी बातें भी तनाव और असंतोष पैदा करती हैं।

 

अत्यधिक इच्छाएँ और अपेक्षाएँ

गीता 16.21:
“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः — कामः क्रोधस्तथा लोभः।”

 

अर्थात् — काम (इच्छा), क्रोध और लोभ — ये तीन ही नरक के द्वार हैं।

 

आज का समाज “ज्यादा पाने” की दौड़ में लगा है।
जितनी इच्छाएँ बढ़ती हैं, उतना ही मन अशांत और जीवन कठिन लगता है।

गीता कहती है — “इच्छाओं को नियंत्रित करो, उनका दास मत बनो।”

 

फल की आसक्ति — चिंता और भय का कारण

गीता 2.47:
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

 

अर्थात् — तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।

आज का मानव हर कार्य में केवल परिणाम देखता है — सफलता, लाभ, मान-सम्मान।

जब फल न मिले तो दुख होता है, और जब मिले तो भय कि “कहीं खो न जाए।”

यही चक्र जीवन को कठिन बनाता है।

 

 

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अहंकार और तुलना की प्रवृत्ति

गीता 3.27:
“अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।”

अर्थात् — अहंकार से भ्रमित व्यक्ति सोचता है कि “सब मैं कर रहा हूँ।”

 

आज का मनुष्य “मैं” और “मेरा” में उलझा है।

दूसरों से तुलना करता है, श्रेष्ठता चाहता है, और असंतोष में जीता है।

गीता सिखाती है — कर्तापन छोड़ो, साधन बनो।

 

ईश्वर से दूरी और आत्मज्ञान का अभाव

गीता 4.7–8:
भगवान कहते हैं — “जब भी धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं अवतार लेता हूँ।”

 

आधुनिक जीवन में भौतिकता बढ़ी है, पर आध्यात्मिकता घट गई है।
जब मनुष्य अपने “सच्चे स्वरूप” (आत्मा) को भूल जाता है, तब उसे जीवन बोझ जैसा लगने लगता है।

 

निष्कर्ष — गीता का दृष्टिकोण

गीता के अनुसार जीवन कठिन नहीं है,
मन की उलझनें और आसक्तियाँ उसे कठिन बना देती हैं।

 

जब मनुष्य—

इच्छाओं को नियंत्रित करता है,

 

कर्म को पूजा मानकर करता है,

 

और परिणाम ईश्वर पर छोड़ देता है,

 

तो वही जीवन शांति, आनंद और सहजता से भर जाता है।

 

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संक्षेप में:

“जो मनुष्य अपने मन को जीत लेता है, उसके लिए जीवन ईश्वर का आशीर्वाद है;
और जो मन से हार जाता है, उसके लिए वही जीवन कठिनाई बन जाता है।”

 

 

गीता के अनुसार आज के आधुनिक जीवन में शांति और संतुलन बनाए रखने के व्यावहारिक उपाय।

कर्मयोग अपनाना — कर्म करो, फल की चिंता छोड़ो

 

गीता 2.47: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

 

आधुनिक जीवन में व्यावहारिक उदाहरण:

नौकरी या पढ़ाई में अपने काम को पूरी मेहनत और निष्ठा से करो।

प्रमोशन या परिणाम की चिंता कम करो।

मन की शांति बनी रहेगी और तनाव घटेगा।

 

 

ध्यान और मानसिक नियंत्रण — मन को स्थिर रखना

गीता 6.6: मन को वश में करना = मित्र, नहीं तो शत्रु।

 

 

आधुनिक जीवन में:

हर सुबह 10–15 मिनट ध्यान या प्राणायाम करें।

तनाव या गुस्सा आने पर गहरी साँस लें और स्थिति को समझने की कोशिश करें।

इससे मानसिक संतुलन और निर्णय शक्ति बढ़ती है।

 

समत्व भाव — सुख-दुःख को समान दृष्टि से देखना

गीता 2.38: सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझो।

 

 

आधुनिक जीवन में:

ऑफिस में आलोचना या सफलता पर समान दृष्टि अपनाएँ।

कठिन परिस्थितियाँ सीखने का अवसर हैं, न कि विफलता।

मानसिक स्थिरता बढ़ती है और जीवन सरल लगता है।

 

भक्ति और समर्पण — भरोसा और आत्मबल

गीता 18.66: “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”

 

 

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आधुनिक जीवन में:

मुश्किल समय में भरोसा रखें कि आप अपने कर्म और प्रयास से मार्ग पा सकते हैं।

आत्म-विश्वास और साहस बढ़ता है।

चिंताएँ घटती हैं क्योंकि मन को कोई स्थायी चिंता नहीं है।

 

स्वधर्म का पालन — अपनी जिम्मेदारियों को निभाना

गीता 3.35: अपना कर्तव्य निभाना, दूसरों की नकल नहीं।

 

 

आधुनिक जीवन में:

अपने काम और भूमिका को ईमानदारी से निभाएँ।

दूसरों की तुलना या सामाजिक दबाव में न आएँ।

आत्मसंतोष और जीवन में संतुलन आता है।

 

सारांश:

गीता के अनुसार आधुनिक जीवन की कठिनाई मानसिक और आध्यात्मिक कारणों से है।
जब हम—

कर्मयोग अपनाएँ,

मन को नियंत्रित करें,

समत्व भाव रखें,

ईश्वर या उच्च शक्ति में भरोसा रखें,

और अपने स्वधर्म का पालन करें—
तब जीवन सहज, संतुलित और आनंदपूर्ण बन जाता है।

 

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