Overcome happiness and sorrow find peace.

सुख-दुख पर काबू पाओ, शांति पाओ।

 

सुख और दुख दोनों अस्थायी हैं — इसलिए उनसे बँधना या डरना व्यर्थ है

जीवन में सुख भी आता है और दुख भी—पर गीता का स्पष्ट संदेश है कि न तो सुख स्थायी है और न ही दुख।
दोनों ही क्षणभंगुर अनुभव हैं जो समय के साथ बदल जाते हैं।

 

जब हम सुख के पीछे भागते हैं, तो हम उससे चिपक जाते हैं—और जैसे ही वह खत्म होता है, मन बेचैन हो जाता है।
इसलिए सुख का पीछा करना कभी पूर्ण संतोष नहीं देता; यह सिर्फ और अपेक्षाएँ पैदा करता है।

 

दूसरी ओर, जब दुख आता है तो मन घबरा जाता है। लेकिन दुख भी स्थायी नहीं है। यह भी मौसम की तरह आता है और चला जाता है।

दुख से डरना व्यर्थ है, क्योंकि जितना हम उससे भागते हैं, वह उतना ही बड़ा लगता है।
साहस और धैर्य से सामना करने पर दुख हमें मजबूत बनाता है।

 

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गीता हमें सिखाती है कि:

सुख में आसक्ति मत रखो और दुख में भय मत रखो।
दोनों जीवन के प्रवाह की लहरें हैं—आती हैं, चली जाती हैं।
वास्तविक बुद्धिमत्ता यह है कि हम इन दोनों स्थितियों में समभाव बनाए रखें।

 

जो व्यक्ति सुख-दुख से परे स्थिर रहता है, वही सच्ची शांति और स्वतंत्रता का अनुभव करता है।

 

“दुख स्थायी नहीं है – इसलिए उससे डरना व्यर्थ है।”

1. दुख भी सुख की तरह अस्थायी है

आज जो दुख है—बीमारी, मन का दर्द, आर्थिक कमी, असफलता—
समय के साथ बदल जाता है।
कुछ भी हमेशा नहीं रहता, इसलिए दुख भी गुज़रने वाला मेहमान है।

 

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2. डर दुख को बढ़ा देता है

असली समस्या उतनी तकलीफ़ नहीं देती,
जितना उससे जुड़ा डर देता है।

डर → चिंता → कमजोरी
पर गीता कहती है कि दुख आए तो बस उसे सहन करो,
क्योंकि वह टिकने वाला नहीं।

 

3. दुख मनुष्य को मजबूत बनाता है

दुख जीवन का शिक्षक है।
दुख हमें—

धैर्य

अनुभव

समझ

परिपक्वता
देकर अंदर से मजबूत बनाता है।

 

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4. गीता कहती है — दुख से भागो मत, उसका सामना करो

अर्जुन युद्ध से दुख के डर में भाग रहा था।
कृष्ण ने कहा:

“तुनक मत, धैर्य रख—दुख आएगा और चला जाएगा।”
भागना दुख को बढ़ाता है, सामना करना उसे कम करता है।

 

5. स्थिर मन दुख से नहीं डगमगाता

जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि
“दुख स्थायी नहीं है”

वह दुख के समय घबराता नहीं, टूटता नहीं,
बल्कि स्थिर होकर सही निर्णय ले पाता है।

 

एक सुंदर सार

दुख समुद्र की लहर की तरह है—आता है और वापस चला जाता है।
लहरों से डरने वाला किनारे पर ही रह जाता है,
लेकिन समझदार व्यक्ति जानता है कि—
हर लहर गुजर जाएगी।

 

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“सुख स्थायी नहीं है – इसलिए उसके पीछे भागना दुख देता है।”

1. सुख क्षणिक है

जो भी सुख हमें मिलता है—

पैसा

प्रशंसा

सफलता

स्वाद

आराम

ये सब थोड़े समय के लिए होते हैं।
इनकी अवधि सीमित है।

 

2. सुख मिलने के बाद मन और चाहता है

मानव मन की प्रवृत्ति है कि उसे जो मिलता है, वह पर्याप्त नहीं लगता।
इसलिए:

सुख → अपेक्षा → और सुख → और अपेक्षा
इस चक्र में मन कभी संतुष्ट नहीं होता।

 

3. सुख का पीछा = निरंतर बेचैनी

जब हम सुख को पकड़ने के पीछे भागते हैं, तो डर लगता है कि कहीं:

वह सुख छिन न जाए

वह खत्म न हो जाए

लोग बदल न जाएँ

परिस्थितियाँ उलट न जाएँ

यही डर दुख का कारण बनता है।

 

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4. गीता कहती है — समभाव सीखो

भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं:
सुख आए तो उछलो मत, दुख आए तो टूटो मत।
दोनों ही आएँगे और दोनों ही जाएंगे।

 

सुख के साथ लगाव (Attachment) और दुख के साथ घृणा (Aversion)
दोनों ही मन को अस्थिर करते हैं।

 

5. जो व्यक्ति सुख-दुख के परे संतुलित रहता है, वही शांत रहता है

गीता ने इसे “स्थिरबुद्धि” और “स्थितप्रज्ञ” कहा है —
ऐसा व्यक्ति न सुख में बहकता है, न दुख में टूटता है।
वह अपने कर्तव्य और जीवन में स्थिर रहता है।

 

एक सुंदर सार

सुख का आनंद लो, लेकिन उससे बँधो मत।
दुख को स्वीकार करो, लेकिन उस पर टूटो मत।
दोनों गुजर जाते हैं—तुम स्थिर रहो।

 

अपना कर्तव्य (धर्म) निभाओ, फल की चिंता मत करो

“कर्मण्येवाधिकारस्ते…”
गीता कहती है कि मनुष्य केवल अपने कर्म पर अधिकार रखता है, परिणाम पर नहीं।

 

परिणाम की चिंता मन को कमजोर करती है।
कर्तव्य का पालन मृत्यु तक मनुष्य का धर्म है।

 

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2. सुख–दुख, लाभ–हानि, जीत–हार में समभाव रखना

जीवन में सब कुछ बदलता रहता है—सुख भी, दुख भी।
जो व्यक्ति परिस्थितियों से डगमगाता नहीं, वही शांत और मजबूत बनता है।
समत्व (equanimity) ही योग है।

 

3. आत्मा न जन्म लेती है न मरती है

“न जायते म्रियते वा कदाचित…”
गीता सिखाती है कि शरीर नश्वर है, पर आत्मा अजन्मा और अविनाशी।
वास्तविक पहचान आत्मा है, शरीर नहीं।

 

4. मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका ‘अवश मन’ है

अनियंत्रित मन दुख देता है, नियंत्रित मन मुक्ति देता है।
मन को साधना ही आध्यात्मिक उन्नति है।

 

5. भक्ति, ज्ञान और कर्म—तीनों मार्ग मोक्ष की ओर ले जाते हैं

गीता तीनों मार्गों को स्वीकार करती है:

कर्म योग – सही कर्म करना

ज्ञान योग – आत्मा और सत्य का ज्ञान

भक्ति योग – ईश्वर से प्रेम और समर्पण

ये तीनों रास्ते मनुष्य को परम शांति तक ले जाते हैं।

 

6. अहंकार त्यागो, विनम्र बनो

अहंकार अज्ञान का रूप है।
ज्ञान वहीं होता है जहाँ विनम्रता और समर्पण हो।

 

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7. हर स्थिति में ईश्वर पर विश्वास और स्वयं पर नियंत्रण

जीवन अनिश्चित है, इसलिए गीता कहती है:
ईश्वर पर विश्वास रखो
अपनी बुद्धि को स्थिर रखो
सही मार्ग से विचलित मत हो

 

8. जीवन कर्मभूमि है, भागने की जगह नहीं

अर्जुन की तरह समस्याओं से भागने की बजाय उनका सामना करना ही धर्म है।

 

सारांश (Ek Line Summary)

“कर्तव्य करो, समभाव रखो, मन को साधो, और आत्मा को पहचानो—यही गीता का सार है।”

 

 

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